सोमवार, 5 अक्तूबर 2020

साँझ


साँझ 
नभ के मग पर पग - पग रखकर
शांत रूप कुछ अरुणिम होकर
घन-सघन को रक्तिम कर कर
दूर क्षितिज पर पहुंचा दिनकर 

देख क्षितिज पर रथ दिनकर का 
मन उद्वेलित हुआ विहग राशि का
अब तक जो भूले थे घर को  
अपना घर याद आया उनको


चोंच में ज्यादा दाना भरकर 
अपने बच्चों का खाना भरकर 
चिड़ियों ने नभ में पंख पसारे 
नभ में उनकी लगी कतारें 

इधर कुछ गाय चुगाते बच्चे 
सांझ बिसारे थे मस्ती में 
घर आओ आवाज आ रही 
उनके घर उनकी बस्ती से 
क्रमशः.......

रविवार, 2 अगस्त 2020

मेरा मन (MERA MANN)


बाहर बरसता घन सघन, अन्दर सुलगता मेरा मन।
बारिश की हर इक बूंद को, खुद में समाता मेरा मन।।
बाहर बरसता.............
कुछ मन उदास पहले ही था, कुछ तेरे कारण ऐ घटा।
कुछ शाम की तन्हाई थी, कुछ उनकी थी रूसवाईयां
ये सब हुए एक साथ लेकिन, फिर अकेला मेरा मन
बाहर बरसता.............
बारिश की बूंदें बाण बनकर, बेधती है तन बदन
सावन की हर शीतल पवन, मन में जलाती इक अगन
और फिर इस आग को, आंसुओं से सींचे दो नयन
बाहर बरसता.............
शून्य से गिरती हैं बूंदें, मेरे मन के शून्य में
अधीर हो उठता हृदय जब, तस्वीर बनती शून्य में
फिर तसव्बुर में खयालों में रहे ये मन मगन।
बाहर बरसता.............
सोचता हूं तुम चले आते हो, इस बरसात में
मेघ जल भीगा बदन, लेकिन लबों पर प्यास है
और फिर इस प्यास को, पाने को तरसे मेरा मन।
बाहर बरसता.............
ये बुलबुलों का शोर और ये मेघमय तड़िता चपल
ये मिट्टी की सौंधी महक हर शाख पर पल्लव नवल
फिर घन नदी पर, घन पवन पर, घन धरा, घनमय गगन।
बाहर बरसता.............
मोटी मूसलधार जलधर जब धरा पर डारता
तृप्त कर वसुधा, पवन का शुष्कपन संहारता
अतृप्त मेरा तन-बदल तृषित रहे ये मेरा मन
बाहर बरसता.............

चौंक पड़ता हूं तुम्हे जब देखता हूं भीगते
नभ के नवागत अभ्र को अधरों को तेरे सींचते
अहोभाग्य अभ्र! दुर्भाग्य तू कह मुझ को कोसे मेरा मन
बाहर बरसता.............
ये बहारें ये फुहारें और फिर मौसम सुहाना।
पत्तियां पल-भर परखती मेघ जल का उनपे गिरना
स्वच्छ निखरी पत्तियां और आसमां पर घन गहन
बाहर बरसता.............
देखता हूं दूर पर कुछ एक विरहन कांपती
आंख से काजल बहाती सोई हुई सी जागती
पाद-नख भू चीरती हो बीते ख्वाबों में मगन
बाहर बरसता.............
वो जहां बैठी हुई है है पहाड़ी एक छोटी
सब तरफ सब कुछ अचर है, चर हवा है, और पानी
देह के सब अंग अचर बस चर रहा है प्राण औ मन
बाहर बरसता.............
उसका मन उसको उठा कर ले गया बीती स्मृति में
ऐसी ही बारिश थी उस दिन ले गया ऐसी स्मृति में 
पी का पहला ही परश व्याकुल हुआ था उसका मन
बाहर बरसता.............
सिर को घुटने रख के बैठी प्रिय पति प्रतीक्षिता।
यौवन की वय कामार्तमय, रोमावली थी पुलकिता।
कैसे मिलन हो प्रिय पी का कर रही सौ सौ जतन।
                                                       बाहर बरसता.............
कुछ धूप में थे तप्त पत्थर और अब बारिश में भीगे
शीत से संतप्त हो वे पत्थरों में बैठ भीगे
आज भी उन पत्थरों पर जा के लोटे मेरा मन
बाहर बरसता.............
पत्थर की हरिता घोटकर पी की हथेली पर लगी
मैं हथेली और वह मुंह मेरा देखती ही रही
कर कमल पर देख पाटल स्तम्भित हुए थे ये नयन
बाहर बरसता.............
मन समन्दर में कई बातें उठे हिल्लोल कर 
पहुंचकर तट होंठ पर उद्विग्न होता शान्त कर
दमन कर दुर्दम्य का उछ्वास छोडे मेरा मन
बाहर बरसता.............
नदी घाटी से मेघ जल भर शिखर के आलम्ब से
स्वर्ग जाते मेघ देखे बनते बिगडते बिम्ब से
तन युगल का स्थिर हुआ मन मेघमय उड़ता गगन
बाहर बरसता.............
स्वर्ग में सुख है निरन्तर पर नही सुषमा वहां
सुख छोड़ सुषमा संग पाते रेत में मृग से वहां
स्वर्गीय सुख नैसर्गिकी सुषमा पे वारे उनका मन
बाहर बरसता.............
अनमने से थे वहां सुख सम्पदा के मध्य में
मन ही गया था स्वर्ग में मन ही नही था स्वर्ग में
सुन तेज तड़ित की ताड़ना वसुधा को भागे युगल मन
बाहर बरसता.............

-अनिल डबराल
फोटो गूगल साभार 

शनिवार, 25 जुलाई 2020

अर्थहीन (ARTHHEEN)



अर्थहीन

शाश्वत समझकर देह को
न देही का कुछ भान है।
बस भौतिकी का ज्ञान है,
बस भौतिकी का ज्ञान है।।


जीवन हुआ है अर्थहीन,
है अर्थयुक्त पर अर्थहीन
जीवन और अर्थ परार्थ हो!
न हो तो वह है व्यर्थ हीन।।

आराम की है तलाश पर,
आ राम! की चाहत नही
चाहे निमिष या दीर्घ सुख
आराम कर आ राम! कर।।

बस सुयश की कामना हो,
प्रेम में कोई काम ना हो।
जीतता है विश्व वो,
ना कामना हो काम ना हो।।

वक्त पर जब पर न हों,
पर पर लगा मंजिल चले।
पर पर सदा पर पर ही हैं
पहुंचे कही पर पर रहे।।

अनिल डबराल


शनिवार, 11 जुलाई 2020

सीख (SEEKH)




1
बागबां ने बरसों पहले
उम्मीद का एक पौधा रोपा था
सोचा था गुलों से महकेगा गुलशन
दरख़्त बनते ही पनाहगार बना उल्लू का
फिर वही कहानी पुरानी

2
बिस्तर पर एक तरफ मैं लेटा था,
तो दूसरी तरफ चंद सिक्के मेरी पहुँच से दूर थे....
बिना कुछ किये उन्हें अपनी तरफ खींचना चाह रहा था 
पर वे टस से मस न हुए 
बाद में पीटने लगा था बिस्तर 
फिर सरकने लगे थे मेरी तरफ...........
अब समझ में आया बिना कुछ किये कुछ नही होता 
हाथ-पाँव तो मारने ही पड़ते हैं.

गुरुवार, 25 जून 2020

मारियो की याद (MARIO)


Photo source: polygon


मारियो की याद (MARIO)

साल बीते सर्दियों की उन दिनों की बात है,
बस घूमकर बीते थे दिन ये उन दिनों की बात हैं

दूर मेरा गांव पहाड़ी और पहाड़ी जिन्दगी
पर हमारी जिन्दगी थी मस्त मौला जिन्दगी
स्कूल थे सब बन्द तब शीतावकाश की बात है
बस घूम कर बीते......................
साल बीते सर्दियों की..................
कुछ हम जवां कुछ दिल जवां और मारियो भी था नया
और उसे रानी दिलाने भटके न जाने कहां कहां।
पर उसे रानी मिली ना ये गजब की बात है
बस घूम कर बीते......................
साल बीते सर्दियों की..................
पंकज जोशीला जोश में आकर ये कहता जोर से
‘‘भैस की आंख आज आर या पार’’ सबको डराता शोर से
दूजी स्टेज पार करली बड़े गर्व की बात है
बस घूम कर बीते......................
साल बीते सर्दियों की..................
रोहित टि-टीट कर चल पड़ा थी सामने बतखों की फौज,
कुछ उड़ रहे कुछ चल रहे, पता ना चला किसने मारी चोच
छोटा हुआ चलता रहा ये बर्गर की सौगात है
बस घूम कर बीते......................
साल बीते सर्दियों की..................
नब्बी नया था खेल में हरवक्त पूछे ‘‘अब क्या कन’’
भैजी ईं स्टेज पार करै द्या अब तुमरी हथ च बचण या मुन्न।
नब्बी के बदले खेलता मैं सब कहते ये गलत बात है।
बस घूम कर बीते......................
साल बीते सर्दियों की..................
नब्बी उछालता मारियो खुद भी उछल पड़ता था वो
जोर से दबाकर बटन रिमोट खराब करता था वो।
दीवार तोड़ पैंसे कमाता बडी निराली बात है।
         बस घूम कर बीते......................
 साल बीते सर्दियों की..................
‘‘झांस-रांस को’’ चल पड़ा मोहित जो चैथी स्टेज में,
अनजान था स्टेज से फिसलन हुई थी बर्फ से।
एक बतख उल्टा किया कहा ‘‘तेरी यही औकात है’’
         बस घूम कर बीते......................
 साल बीते सर्दियों की..................
                                                                                                  
-अनिल डबराल 




बुधवार, 17 जून 2020

बच्चे (Children)

photo source- google

बच्चे

अभी आकाश सूना था,
अभी नभ नीले रंग में था।
अभी स्कूल में थे बच्चे और,
मैं अपनी छत पे बैठा था।

बजी घंटी हुई छुट्टी, 
बच्चों ने बांध ली मुठ्ठी।
बच्चे अपने घर को भागे,
ज्यों ट्रेन स्टेशन से छूटी।

खा-पीकर केे अब बच्चे,
अपनी अपनी छतों पर हैं।
पतंग और डोर ले हाथों में,
अब नभ को सजाते हैं।

ये बच्चे प्यार की सूरत,
ये बच्चे ईश की मूरत।
अभी जो लग रहे तारे,
वो कल नभ के बनें सूरज।

हल्की सी डांट पे रो देते
हल्की सी लाड़ पे हँस देते।
किलकारियों अठखेलियों से
ये घर आंगन सजा देते।
                                    अनिल डबराल

सोमवार, 8 जून 2020

बादल

बादल
PHOTO SOURCE: GOOGLE

बादल हूं मैं या बादल की तरह बिखरा हुआ हूं,
धरा से दूर हूं पर............. न नभ तक पहुंचा हुआ हूं.......
न डर है मुझे खुद से धरा को देखकर...
ना गर्व है कि मैं गगन को चूमता हूं।
रात- दिन करता हवा के संग सफर
लक्ष्यहीन हूं या लक्ष्य से भी पार तक पहुंचा हुआ हूं।
                                                                                                                  
-अनिल डबराल