शनिवार, 8 मई 2021

हिन्दी काव्यशास्त्रीय रसों के परिप्रेक्ष्य में गढ़वाली लोकगीत


बुरांस राज्य वृक्ष 

हिन्दी काव्यशास्त्रीय रसों के परिप्रेक्ष्य में गढ़वाली लोकगीत

               भारत विविधताओं का देश है। यहां भौगोलिक, सांस्कृतिक, धार्मिक जैसी विविधताओं के साथ भाषिक विविधता भी प्रायः देखने को मिलती है। अगर केवल हिन्दी की बात करें तो भारत में हिन्दी की 05 उपभाषाओं सहित 18 बोलियां मुख्य रूप से बोली जाती हैं। हिन्दी की उपभाषा पहाड़ी हिन्दी में मध्य पहाड़ी के अन्तर्गत गढ़वाली और कुमांयूनी  भाषाएं आती हैं। ये भाषाएं खस (कुछ अन्य मतों में शौरसेनी) अपभंश से निकली मानी जाती हैं। गढ़वाली भाषा का गढ़वाल मण्डल के सातों जिलों के अलावा कुमांयूं के रामनगर क्षेत्र में असर देखने को मिलता है। ग्रियर्सन ने गढ़वाली के कई रूप जैसे- श्रीनगरी, बधाणी, सलाणी टिहर्याली, राठी, दसौल्या, माझ, कुमैया आदि बताए थे।1 

               प्रसिद्ध भाषाविद् मैक्समूलर ने अपनी पुस्तक ‘‘साइंस ऑफ़ लैंग्वेज’’ में गढ़वाली को प्राकृतिक भाषा माना है। लेकिन डाॅ. ग्रियर्सन ने ‘‘लिग्विस्टिक सर्वे ऑफ़ इण्डिया’’ में भारतीय भाषाओं का विभाजन करते हुए मध्य पहाड़ी की स्थिति भीतरी उपशाखा में निर्धारित की है।2 गढ़वाली भाषा में लोकगीतों की अपेक्षा साहित्य बहुत कम मात्रा में उपलब्ध है। इस भाषा के साहित्यकारों ने पुराने समय में अधिकांशतः काव्य में ही अपनी रचनाएं लिखी। आचार्य गोपेश्वर कोठियाल 26 जनवरी 1954 में प्रकाशित गढ़वाली साहित्य की भूमिका में गढ़वाली साहित्य और कला नामक एक लेख में लिखते हैं कि- ‘‘गढ़वाली साहित्य लोकगीत, लोकगाथा, काव्य और समालोचना यूं द्वि भागों मा ही मिलद। मध्यकालीन युग की प्रवृत्ति का अनुसार लोग कविता की रचना ही काव्य की रचना समझदा छ्या। अतएव गढ़वाली काव्य मा कविता ही प्रमुख रूप मा मिलदन। महाकाव्य या खण्डकाव्य का रूप की गढ़वाली भाषा मा क्वी काव्य रचना नि होए। प्राचीन गढ़वाली कविता मुक्तक का रूप मा ही मिलदन’’3
    रस काव्य का अनिवार्य अंग है। आचार्य भरतमुनि के अनुसार ‘‘विभावानुभावव्यभिचारिसंयोगाद्रसनिष्पत्तिः’’ अर्थात् विभाव, अनुभाव, व्यभिचारी भावों के संयोग से रस की निष्पत्ति होती है। रस की स्थापना प्राचीन समय से ही काव्य में है। तैत्तरीय उपनिषद् में ‘‘रसो वै सः’’ कहकर रस को आनन्दस्वरूप ब्रह्म कहा गया है। भरत मुनि नाट्यशास्त्र में लिखते हैंः- 

यथा हि बहुद्रव्ययुतैव्यंजनै बहुभिर्युतम्
आस्वादयन्ति भु´्जाना भुङ्क्ते भुक्तविदोजनाः
भावाभिनय संयुक्ताः स्थायिभावास्ततो बुधाः
आस्वादयन्ति मनसा तस्मानाट्यरसाः स्मृता।

 

        वास्तव में रस अनुभूति का विषय है और इसको अनुभव करने के लिए सहृदय होना परमावश्यक है। एक सहृदयी ही साहित्य के रस का वास्तविक आनन्द उठा सकता है। वह हास्य का हास, श्रृंगार का सौन्दर्य, करुण की करुणा, रौद्र की भयानकता के साथ-साथ सभी रसों के स्थायीभावों में मनोभावानुसार आनन्द प्राप्त करता है। एक अलंकृत काव्य सौंदर्ययुक्त लेकिन नीरस है तो वह कुछ समय के लिए बुद्धि का विलास कर सकता है। लेकिन रसयुक्त होते ही उसका प्रभावक्षेत्र मन और हृदय तक हो जाता है। गढ़वाली लोक-गीतों के रचनाकार भले ही हिन्दी संस्कृत के आचार्यों के समान रसज्ञ नही रहे होंगे, परन्तु उन्हे रस का ज्ञान नही था ये कह देना सर्वथा अनुचित होगा। लोकगीत सामान्य जनता के गीत होते हैं इनमें ‘‘लोक’’ की परम्परा, संस्कृति, सभ्यता, इतिहास, आचार-विचार, व्यवहार, हर्ष, विषाद आदि बातों का पता चलता है। विभिन्न अवसरों पर गाए जाने वाले लोकगीतों में उस समय के रीति-रिवाजों और तात्कालिक परस्थितियों के बारे में पता चलता है। गढ़वाली लोक-गीतों के आरम्भ के सम्बन्ध में कुछ कह पाना संभव नही है, यहां भी शायद पंत जी का कोई वियोगी कवि रहा होगा जिसके आंसुओं से कोई अंजान कविता बही होगी। तभी तो गढ़वाली लोक-गीतों की रचना सभी रसों में होने के बाद भी करुण रस सर्वाधिक लोकगीतों में प्राप्त होता है। 
इस परिप्रेक्ष्य में नवरसों को भक्ति रस और वात्सल्य रस के साथ क्रमशः गढवाली लोक गीतों के सन्दर्भ में समझने का प्रयास करते हैं-
      

   1.गढ़वाली लोकगीतोें में श्रृंगाररस- श्रृंगार को रस राज भी कहा जाता गया है। भोज ने अपने ग्रंथ श्रृंगार प्रकाश में श्रृंगार की श्रेष्ठता सिद्ध करते हुए लिखते हैंः-

श्रृंगार वीर करुणाद्भुत हास्य रौद्रः
वीभत्स वत्सल भयानक शान्त नाम्नः।
आस्नासिषुर्दशरसान् सुधियो वदन्ति
श्रृंगार एव रसनार्द्रसमामनाम।
        श्रृंगार रस का स्थायी भाव रति है। स्त्री-पुरूष के परस्पर आकर्षण से इस रस की निष्पत्ति होती है। इसके दो भेद हैं 1. संयोग श्रृंगार व 2. वियोग श्रृंगार। गढ़वाली लोक गीतों में संयोग एवं वियोग दोनों ही रसों में लोकगीतों की रचना हुई है। गढ़वाली के खुदेड़ गीत प्रायः वियोग श्रृंगार के होते हैं। गोविन्द चातक गढ़वाल के लोकगीतों में श्रृंगार के बारे में लिखते हुए कहते हैं किः- ‘‘प्रथम दृष्टि में ही अपनी ओर खींच लेने वाला रूप गढ़वाल को वरदान में मिला है। प्रकृति के बीच कृत्रिम जीवन की सीमाओं के बाहर वहां सौंदर्य घास की तरह उगता है, फूल की तरह खिलता है। गढ़वाल की वन की अकृत्रिमताओं के बीच निर्मित हुआ है। वहां सौंदर्य न कोमलता का नाम है, न शक्तिहीनता का’’4
इसकेे कुछ उदाहरण निम्नलिखित हैः- 

अ- गढ़वाली लोकगीतोें में संयोग श्रृंगारः-

1
त्यारा रूप की झौळ मा नौंणी सी ज्यू म्यारु गौळी भी ग्याई जौळी भी ग्याई।
कक बटी लैई स्या घुघुती सी सांखी, कक पाई होली सी छुंयाल आंखी
तौ आंख्यूं को रगर्याट तेरा मन की बात बोली भी ग्याई खोली भी ग्याई
देवतों की टक्क त्वेमा मनख्यिूं को ज्यू च तेरी मुखड़ी का सासा चकोर लग्यूं च
त्वे देखी हेराम स्यू ब्यखुनी कू घाम सेळे भी ग्याई अछले भी ग्याई।
2
गीत लाणा तांदी बल गीत लाणा तांदी
मैं बुलौंदु उंडु उंडु फुन्डू फुन्डू  जादी
स्योंदी लाई फोंदी बल स्योंदी लाई फोंदी
मै लगांेदु मन माया तु आंखी घुरौंदी
कांधा सारी डोली बल कांधा सारी डोली
मेरी माया की गिडाक घर जै की खोली
भैंसी बांधी छानी बल भैंसी बांधी छानी
सचु मायादार ह्वेली निभैलु सदानी

 

                    पहले गीत में नायक आश्रय एवं नायिका आलम्बन है, नायिका की घुघुती (पक्षी विशेष) सी गर्दन, छुंयाल (बातूनी) आंखें, आंखों की चपल चंचलता आदि उद्दीपन को पुष्ट करता है। हर्ष, उत्कंठा आदि संचारी भाव स्पष्ट होते हैं। साथ ही दूसरा गीत एक युगल गीत है जिसमें आश्रय आलम्बन परस्पर नायक-नायिका हैं। नायक के द्वारा नायिका को पास बुलाना, नायिका का दूर जाना, प्रेमाभिनय पर बनावटी गुस्सा दिखाना आदि उद्दीपन हैं। हर्ष, उत्कंठा शंका आदि संचारी भाव है। 
                ब- गढ़वाली लोकगीतोें में वियोग/विप्रलंभ श्रृंगारः- गढ़वाली लोक गीतों मे वियोग श्रृंगार के कई गीत मिलते हैं, गढ़वाल की प्रसिद्ध कथा रामी-बौराणी में रामी का पति उससे बारह बर्ष तक दूर था। उसी सन्दर्भ में अनेकों मार्मिक गीतों की रचना हुई। आज भौगोलिक दूरियां दूरियां नही रही, संचार क्रांति के द्वारा आज जब मन होता है तब हम अपने परिजनों से बात कर लेते हैं, उन्हे प्रत्यक्ष देख लेते है, परन्तु परस्थितियां आज से 10-20 वर्ष पहले तक ऐसी नही थी। तब पहाड़ों में प्रियजनों का हाल चिठ्ठी द्वारा प्राप्त होता था।
1
कोठारी को गांजा, कोठारी को गांजा।
अफू गैल्या परदेश घर डाले बांजा।।
घ्यू खाए छकीक, घ्यू खाए छकीक।
बला दिल त्वैमा दीने नि जाणे रखीक।।
हलाया त आम, हलाया त आम।
ओठड्यूं को पाणी सूखे उड्यार सी घाम।।
सकीनो सुजायो सकीनो सुजायो।
बाबरो पराण सुआ बैठीक बुझायो।।
मैत कु कल्योउ मैत कु कल्योउ।
कै बैरीन फट्याए जोडी को मलेउ।।
2
चुल्लु जगांदी बगत आई कभी चुल्लु मुझौंदी बगत आई
नि घुटेइ फिर गफा तुमारी याद खादी बगत आई
दूर यख परदेश मां लगणी च खुद बकी बात की 
कभी बडुली थमदी बेर कभी आंसू लुकौदी बगत आई
3
से गेनी पौन पंछी गौं गुठ्यार से गेनी
मी यखुली बिज्यूं छौं तुमारी खुद मां
पौंखुर ढिकेण ले की चखुला से गेनी
देखी तौन सेगी डाली मौन ह्वे ग्येनी
से ग्ये ह्वेला तुम भी बेसुद नींद मां
मी यखुली बिज्यूं छौं तुमारी खुद मां
            पहले गीत में नायिका जो प्रोषितभर्तृका है आश्रय है, उसका पति आलम्बन है, उनका विछडना, घर का सूना होना, आदि उद्दीपन है अभिलाषा, चिन्ता, स्मरण, शोक आदि संचारी भाव हैं। दूसरा गीत एक युगल गीत है इसके नायक-नायिका परस्पर आलम्बन आश्रय हैं। परदेश में नायक को नायिका की याद, नायिका का हिचकी रोकना, अपने आंसूओं को छुपाना उद्दीपन है। स्मरण, शोक चिन्ता आदि संचारी भाव हैं। तीसरे गीत में नायक आश्रय है नायिका आलम्बन है। पक्षी, पेड़ हवा के समान नायिका को बेसुध होकर सोना उद्दीपन को पुष्ट करता है। विषाद, स्मरण, मोह आदि संचारी भाव हैं।
                2..गढ़वाली लोकगीतोें में हास्य रसः- गढ़वाली लोकगीतों में हास्य रस भरपूर मात्रा में मिलता है। विवाह के समय बारातियों को मीठी गाली देने का रिवाज केवल गढ़वाल में ही नही वरन् देश की अन्य संस्कृतियों में भी मिलता है। गढ़वाल में लोग विनोदप्रिय होते है। कितने भी कष्ट हो वे उनको अपनी भोली मुस्कान से फीका कर देते हैं। वास्तव में सृष्टि में मनुष्य ही एक प्राणी है जो हंसता है। अन्य प्राणी प्रसन्न हो सकते हैं, परन्तु हंसना मानो बस मनुष्य को आता है। महानगरों में जहां लोगों के मुख पर प्रायः निराशा दिखाई पड़ती है वही पहाड़ के लोग शान्त या फिर हास्य विखेरते मिलेंगे।
1
भात देंद पौणों करछी लांद दीठ, हमन नी जाणी लुवार को जायो।
मिठै देंद पौंणों पुडखी लांद दीठ, हमन नी जाणी हलवै को जायो।
छिः लाडी जूठो नी खाणो, तू लाडी सुकुल की जाई।
छिः लाड़ी जूठो नि खाई तू लाडा लुवार को जायो।।
खोल बेटी कंकण सुकुल की जाई
खोला बेटा कंकण तेरी बोई लीग्या मंगण
2
दादी न तब ओद गाड़ी अला ब्याटों दादा कागी
हुक्का नि सुणेणु आज बुढ्या नि दिखेणु का च।
दादा कागी दादा कागी नौन्यालु की फौज भागी
हमरू दादा हरच ग्याई कैन देखी कैन पाई
पांडा उभरा साली खोजी ढैपुरा तक नाती पौछी
झुल्ला कुटरा फुल्यै गेनी उना दड़क खुलै गेनी
घौर बौंण डांडा सारी पौसान तलक धाद मारी 
मवार आदिम आवा भैर बुढ्या खोजी ल्यावा भैर
3
परसि बटी लगातार बार-बार को बुखार
चढ्यूं चा रे डाकटार मुरदु छौं उतार उतार
सफेद गोली खपदी नी लाल पिंगली पचदी नी
गुलको शीशी चढ़दी नी पिसीं पुडिया लडदी नी
क्यपसूल खै नी सकदु इंजक्सन मी सै नी सकदु
झूठ त्वै मां किलै बुन तेरे हथ च बचण मुन
ज्या कुछ कन अब तिनै कन
खांदू छौं पचै नि सकदू बिना खयां मि रै नि सकदू
उंद उभ बगत बगत गरम ठंडु मै नि खपद
मीठी दवै तिन देण नी कडी दवै मिन पेण नी
झूठ त्वै मां किलै बुन तेरे हथ च बचण मुन
ज्या कुछ कन अब तिनै कन

 

                इसमें प्रथम गीत में दूल्हा और बाराती आलम्बन और ग्रामीण स्त्रियां आश्रय हैं। अपनी पुत्री को सुकुल की बताना और दूल्हे को लुहार का बेटा बताने में, दुल्हे की मां को मांगने वाला (भिखारी) ले गया, आदि हास को उद्दीप्त करते हैं। तो दूसरे गीत में दादी और उसके पौत्र आश्रय व दादा की खोज का प्रयास आलम्बन है। हुक्का न सुनाई देने से दादा का लापता होने का अंदेशा, पौत्रों की फौज द्वारा दादा की खोज, जिसमें कि कपडे़ की गठरियां खोलना, अनाज के दवळों के दड़कों को खोलना आदि स्थान पर उद्दीपन को पुष्ट करते हैं। इनमें हर्ष, गर्व, प्रकृति गोपन, आदि संचारी भाव स्पष्ट होते हैं। तीसरे गीत में डाॅक्टर आलम्बन, मरीज आश्रय। अपनी बीमारी आदत और शर्तों जैसेः- सफेद गोली का अनुकूल न होना, लाल-पीली का न पचना, कैप्सूल न खा पाना, इंजैक्शन न सह पाना आदि हास को उद्दीप्त करते हैं। इसमें भी हर्ष, गर्व, प्रकृति-गोपन आदि संचारी भाव पुष्ट होते दिखाई देते हैं।

 

3. गढ़वाली लोकगीतोें में रौद्र रसः- गढ़वाली लोकगीतों में रौद्र रस अधिकांशतः जागरो पवांणों में देखने सुनने को मिलता है। इस रस से लबालब भरे जागरों को जब जागरी या औजी डौर, थाली, हुडका, या फिर ढोल दमौ के साथ गाते हैं तो शरीर में एक रोमांच हो उठता है। इन जागरों की भाषा इतनी ओजपूर्ण होती है कि लोगों पर देवता अवतरित हो जाते हैं, और अंगारों पर चलना, चाबुक से खुद को घायल करना, अंगार चबाना, गर्म लोहे को चाटना आदि  ऐसे ऐसे कार्य कर जाते हैं जो सामान्य अवस्था में वे नही कर सकते। 

कौन देश का आई जटा फिंकराई
सौ मण लुवा की सांगल कसिकी पगमुडी बधांउ
आओ रे मेरा मैंमन्दा बीर मंत्र तेग आउ
चडन्तो आउ पडन्तो आउ गाजन्तो आउ गर्जन्तो आउ
उपरन्तो आउ डुकरन्तो आउ किलकन्तो आउ बिलकतो आउ
चैदन्तो फिरन्तो आउ तोडतो आउ मेरा मैमन्दा आउ 

            रौद्र रस का स्थायी भाव क्रोध है, रुद्र इस रस के देवता व लाल वर्ण है। प्रस्तुत गीत में मैमंदा वीर का आवाहन किया गया है, यही इसका आलम्बन है। उग्रता पूर्वक उनका आवाहन, ललकारपूर्ण आगमन, गर्जना करके हुए आना आदि उद्दीपन हैं। गर्व, उग्रता, चपलता, आवेग संचारी भाव हैं। 

            4.गढ़वाली लोकगीतोें में वीर रसः-गढ़वाल वीरों का देश है, यहां पर अनेक इतिहास प्रसिद्ध वीर एवं वीरबालाएं हुई हैं माधो सिंह भण्डारी, कनक पाल, कफू चैहान, पन्थ्या दादा, तीलू रौंतेली चन्द्र सिंह गढ़वाली, आदि प्रमुख हैं पुराने समय में यहां पर ठकुरी राजाओं के 52 गढ़ थे। ये सभी वीर और साहसी राजा हुए। उत्तराखण्ड के अधिकांश युवा देश की सेना में अपना योगदान दे रहे हैं। द्वितीय विश्वयुद्ध में भी गढ़वाल के अनेकों सैनिकों ने भाग लिया था।

1
प्यारा हिंवाला की ऊंची सिराण्यूं मां छींटो न फेंक द्यो क्वी सुरता रख्यान आंखीं।
तुम सांस का सयाणा माधो अर धौं कलूसी करद्या भिड़न्त भारी शमसीर छाल ढ़ागी।
आंखा उठैकी देखू दुश्मन हमुं कभी ना उठ जा महाबल्यूं तुम काटी द्या तौंकी सांखी।
र्वैसा बणैकी नाचा रौंतेली का भुलौं कफ्फू चैहान बणीजा जर्वत च आज यांकी
2
बीरू भडु कु देश बावन गढु कु देश, जै जै बदरी केदार गढ़ भूमि गढ़ नरेश।
ल्वेगढ़ बडियार गढ़ लोदन भरदार गढ़, गढु का गढ़पति ह्वेन बड बड सरदार भड़।
तोपगढ का तोपाल चैंडागढ़ का चैंड्याल, चांदपुर गढ़ नरेश महाराज कनकपाल।
तीलू भण्डारी रणू रौत इन भड ह्वेन मुण्डु का चैरा चीणी अर ल्वै का घट रिंगैनी।
बीरू गढु कु देश...........
चांदपुर गढ़ फल्याण बधाण्यूं को गढ़ बधाण कुंजडी भरपूर गढ़ क्वीली गढ़ का सज्वाण।
मौल्या अर रैकागढ का गढ़पति रमोला ह्वेनी, माधो लोधी रिखोला भोटन्त जीती की एैनी।
उप्पूगढ़ को जवान धन रै कफ्फू चैहान, काटी भी सिर नि झुके कन रै होलु स्वाभीमान।
बीरू भडु कु देश..................
                
 
                वीर रस की गणना प्रधान रसों में होती है। इसके देवता महेन्द्र व वर्ण स्वर्ण गौर माना गया है। उत्साह इस रस का स्थायी भाव है। पहले गीत में वीर सैनिक आलम्बन हैं। साहस में श्रेष्ठ, युद्ध के लिए प्रेरित करना, दुश्मनों का सर कलम करना आदि उद्दीपन हैं। क्रोध, रोमांच, उग्रता आदि स्थायी भाव हैं। दूसरे गीत में गढ़वाल के वीर भट गढ़पति आलम्बन है। उनके वीरत्व का स्मरण, खून के घराट घुमाना, कटने के बाद भी स्वाभीमानी का सिर न झुकना उद्दीपन को परिपुष्ट करते है। क्रोध, रोमांच, उग्रता स्थायी भाव हैं।
        5. गढ़वाली लोकगीतोें में करुण रसः- गढ़वाली लोकगीतों में खुदेड़ गीतों की परम्परा पुराने समय से ही चली आ रही है, इन गीतों में यादों का एक सशक्त चित्रण होता है। नायक नायिका के द्वारा विरह के गीत हो, अथवा मायके की याद में गाए गीत सभी में करूण रस का प्रभावी संचार मिलता है। गढ़वाल की बेटियां आज भी शादी तय होने के दिन से ही मायके के बिछुडन को याद करके रह रह कर रोने लगती हैं। गढ़वाल में भावुकता कुछ अधिक दिखाई पडती है। नन्दा देवी राजजात में जब मां नन्दा को कैलाश के लिए स्थानीय लोग विदा करते हैं तो वे अत्यधिक भावावेश में रोने लगते हैं। वे नन्दा को वे लोग मां तो समझते ही हैं परन्तु विदाई के समय वे मां को अपनी पुत्री के समान विदा करते हैं। विभिन्न परस्थितियों में गढ़वाली लोकगीतों में की एक झलक देखिए-
एक नवविवाहिता अपने मायके को देखने के लिए पहाड़ों से कहती है कि-

 

1
हे उंची डाडिृयूं तुम नीसी ह्वे जावा
घणी कुलांयूं तुम छांटी ह्वे जावा
मैं कू लगीं च मैतुड़ा की खुद
बाबा जी को देश देखन द्यावा
2
सैरा बसग्याल बौंण मा रूड़ी कुटण मां ह्यूंद पीसी वितैन
म्यारा सदनी इनी दिन रैन
मेला ह्वेनी खौला ह्वेनी सौंजड्या कौथिग गेनी
बारा मैंना गौलु कैकी मेमा द्वि झुल्ली नि रैनी
स्वामी जी भी मै ते बिसरी ग्येना
म्यारा सदानी इनी दिन रैना
बेट्यूं का खुदेड मैना चैत पूस एैना गैना
मैत्यूं का सासा छाई तौन रैबार नि द्याई
दगड्या भग्यान मेरी मैतु गैेना
म्यारा सदानी इनी दिन रैना

 

 
                जिस प्रकार भोज केवल श्रृंगार को ही रस मानते हैं, उसी प्रकार भवभूति ने केवल करुण रस को की रस माना है। उनके अनुसारः- ‘‘एको रसः करुण एव निमित्तभेदात्’’ प्रथम गीत में एक विवाहिता स्त्री आश्रय एवं मायका आलम्बन है। अचेतन वस्तु जैसे- पहाड़ों से झुक जाने, और चीडों से पृथक् होने की प्रार्थना उद्दीपन है। इसमें संचारी भाव मोह, शोक, स्मरण आदि हैं। दूसरे गीत में दुःख के दिन, स्वजनों का पक्षपातपूर्ण व्यवहार, मायके के प्रति आशावान् होने पर भी निराशा होना, प्रिय का परदेश जाकर उस भूल जाना आदि उद्दीपन हैं। 
                6. गढ़वाली लोकगीतोें में अद्भुत रसः- गढ़वाली लोकगीतों में अन्य रसों की भांति अद्भुत रस का एक उदाहरण यहां पर प्रस्तुत किया है। इसमें नायिका के अंग-प्रत्यंगों में गढ़वाल के मुख्य-मुख्य स्थानों का अद्भुत वर्णन कवि ने किया है। गढ़वाल स्वयं में अद्भुत है। इसमें छल-कपट जैसे कृत्रिम आवरण नही है। इसके लोकगीतों भी स्थान-स्थान पर अद्भुतता से ओत-प्रोत हैं।

 

1
छौं मी घंघतोल मां तू किलै हैंसी होली
माया चा त जोड़ी जा भरम बोदी त तोड़ी जा छौं मी घंघतोल मां
बालापन का दिनु की बात कुछ होरी छेई ज्वानी मा कै देखिक हैसणु क्वी खेल नी
माया चा त जोड़ी जा भरम बोदी त तोड़ी जा छौं मी घंघतोल मां
रंग भी वी च रूप भी वी, वी सुभौ च वै हिटैई,
आज का हैसण मा तेरा फरक पड़ी त पड़ किलैई
2
कक लगाण छ्वीं कैमा लगाण छ्वीं 
ये पहाड़ की कुमौं गढ़वाल की
सरग तेरी आसा कब आलू चैमासा
गंगा जमुना जी का मुल्क मनखी गोर प्यासा
क्या रूडी क्या ह्यूंद पाणी नी च बूंद
फिर बणी च योजना देखा अब क्या हूंद
कक लगाण छ्वीं
कूड़ी टुटणी ठेस मा छिपडा लग्यां रेस मां
मूसा बिरला भितर वस्यां मनखी भैर देश मां
न भितर न भैर कखी भी नी च खैर 
दिन मां गिज्यूं बाघ राती भ्यूंचुला की डैर
कक लगाण छ्वीं
2
सच माना न माना वींकी पछ्याण कुछ हौरी छई
बात बिचार बुलण बच्याणम रस्याण कुछ हौरी छेई
यनी भी नि छे वा उनी भी नि छे जन तुम सुचण तन भी नि छे 
सच पूछा त कनी भी नि छे क्या बताण कुछ हौरी छेई
लाखु की भीड़ मा देखी छे भीड़ मा छे पर एकी छे
बणी ग्ये त बणी ग्ये बिधाता न अब नी बणाण कुछ हौरी छेई
देखल्या त देखदै रै जैल्या सोचल्या त सोचदै रै जैला 
कलम कण्ठ रुक गेनी गुण क्या गाण कुछ हौरी छेई

 

                        अद्भुत रस का स्थायी भाव विस्मय या आश्चर्य है। इसके आलम्बन में अलौकिक दृश्य, वस्तु या चरित्र होता है। ऐसे चरित्र के बारे में बार-बार सोचना, सुनना आलम्बन होता है। पहले गीत में नायक आश्रय नायिका के हंसी हाव-भाव आलम्बन है। नायिका की आज की अभूतपूर्व हंसी से नायक विस्मय की स्थिति में है। वह समझ नही पा रहा है कि ये माया (प्रेम) है अथवा उसका भ्रम है। इस गीत में भ्रम, हर्ष, उत्सुकता आदि संचारी भाव हैं, तो दूसरे गीत में गढ़-कुमौ की पलायन की स्थिति आलम्बन है। गंगा-यमुना जैसी सदानीरा नदियों के होने पर भी मनुष्य और पशुओं का प्यासा रहना, ठेस लगते ही घरों का टूटना, चूहे बिल्ली का घर के अन्दर तथा मनुष्यों का शहरों में पलायन आदि विस्मय को उद्दीप्त करता है। तीसरे गीत में नायक आश्रय अद्वितीय नायिका आलम्बन है। नायिका का व्यक्तित्व, बातों में आनन्द, लाखों में एक अलग होना, उसको देखने पर देखते ही रह जाना, सोचने पर सोचते ही रह जाना आदि उद्दीपन का परिपाक करता है। भ्रम, हर्ष, उत्सुकता आदि इसके स्थायी भाव है।

 

7. गढ़वाली लोकगीतोें में वीभत्स रसः- गढ़वाल के लोकगीतों में तो वीभत्स रस बहुत कम देखने को मिलता है, परन्तु यहां देवी-देवताओं के जागरों में वीभत्स रस प्रायः देखने को मिल जाता है। गढ़वाली लोकगीतों अथवा जागरों में वीभत्स रस का प्रयोग दैत्य संहार या युद्ध वर्णन में मिलता है। सामान्य लोकगीतों अथवा साहित्य में वीभत्स रस प्रायः नही मिलता। देवी के जागरों में युद्ध वर्णन में वीभत्स रस के दो उदाहरण दृष्टव्य है-

 

1
नारैणी नारैणी
तिल मारी किलक्वार नारैणी तू ह्वेगे विकराल नारैणी
तेरो लोहा को खप्पर नारैणी तेरो तांबा को पतर नारैणी
होली ल्वै की तिसाली नारैणी छई मांसू की भुक्याली नारैणी
तिल प्रचंड रूप धारे नारैणी पौंछे दैंत्यूं दल बीच नारैणी
ह्वेगे ह्वेग उदमातो नारैणी तेरो स्यो बबरशेर नारैणी
होली ल्वै की तिसाली नारैणी छई मांसू की भुक्याली नारैणी
बगनै ल्वै का छंछेडा नारैणी लगिनी मुंडु का गुंडका नारैणी
अब नि थामेंदु योधा नारैणी दैंत्यूं का कट्यां मुंड नारैणी

 

            वीभत्स रस का स्थायी भाव जुगुप्सा है। इसके देवता महाकाल हैं। रुधिर मांसादि का वर्णन आलम्बन है, तथा भय, आवेग, व्याधि, अपस्मार आदि संचारी भाव हैं। इसके पहले उदाहरण में महाकाली अवतार आश्रय तथा दैत्यदल मर्दन आलम्बन है। लहू की प्यासी, मांस की भूखी, लहु के झरने बहना, कटे सिरों की ढेर आदि उद्दीपन को पुष्ट करते हैं। हंसना, किलकार मारना, अनुभाव, तथा भय, हास, आवेग, उग्रता आदि संचारी भाव है।

 

 
                8. गढ़वाली लोकगीतोें में भयानक रसः- गढ़वाल आपदाओं विपदाओं से समय-समय पर दो-चार होता रहा है। प्रतिवर्ष बरसात में अतिवृष्टि और बादल फटने की घटनाओं के साथ-साथ नरभक्षी बाघ, दरकते पहाड़ आदि से पहाड़ का जनमानस त्रस्त हो जाता है। इसकी भयानकता का वर्णन भी लोकगीतोें में भी समय समय पर होता रहा है। आजकल चन्द्रसिंह राही जी का प्रसिद्ध गीत फ्वां बागा रे पर लोग झूमते नाचतेे है, परन्तु गढ़वाल मे वह एक त्रासदी का समय था। प्रस्तुत गीत में भी एक बाघ के द्वारा एक 17 वर्षीय बालिका को अपना निवाला बनाए जाने की एक भयानक कथा है। सतपुली में सम्वत 2008 में  नयार में आयी आपदा के गीत भी उस समय लोगों के मुख पर थे।

 

1
सुमा हे निहोण्या सुमा डांडा न जा, न जा हे खडोण्या सुमा डांडा न जा
लाडा की ब्यटुली सुमा डांडा न जा, यखुली यखुली सुमा डांडां न जा
खैणी त जिलकी सुमा खैणी त जिलकी
दोबदो दोबदो बाघ तेरी घण्टी बिलकी
गोरू मा की ग्वैनी सुमा गोरू मा की ग्वेनी
अधखयीं तेरी लाश देखी सैरा गौं का र्वेनी
2
बीसा सौ आठ ले भादो मास
सतपुली मोटर बगीन खास
नयार बढ़ीगे कनो पाणी
किस्मतन कन बात ठाणी
खड़ उठा भायों देखा भैर 
बगीक औणा सांदण खैेर।

 

                भयानक रस का स्थायी भाव भय है, हिंसक जीव तथा उग्र स्वभाव के व्यक्ति इसका आलम्बन है। हाथ-पैर कांपना, विवर्णता, कंठावरोध, चिल्लाना, भागना आदि अनुभाव हैं। शंका, मोह, दैन्य, चिंता, त्रास, मरण, जुगुप्सा आदि संचारी भाव हैं। पहले गीत में सूमा नामक युवती आश्रय तथा नरभक्षी बाघ आलम्बन है। नरभक्षी बाघ द्वारा गले पर हमला करना, अधखायी लाश देखकर सारे ग्रामीणों का रोना उद्दीपन है। दैन्य, त्रास, मोह, मरण संचारी भाव हैं। दूसरे गीत में नयार आश्रय तथा उसकी भयंकर बाढ़ आलम्बनत्व को पुष्ट करती है। नयार का बढ़ा हुआ पानी, बहकर आते खैर और सांधण के पेड़ उद्दीपन तथा दैन्य, आवेग, चिन्ता, त्रास आदि संचारी भाव हैं।
                9. गढ़वाली लोकगीतोें में शान्त रसः- गढ़वाली लोकगीतों में शान्त रस में पुराने समय से ही रचनाएं होती रही हैं, पुराने समय में औजी या गुरू गोरखनाथ सम्प्रदाय के डळया जाति के सन्त लोग गांवों में घूम-घूमकर एकतारा पर गोपीचन्द के सन्देशों को सुनाते थे, इसके अलावा भी पुराने समय में गांवोें में साधु सन्त यहां बद्री केदार तीर्थाटन पर आते थे उनका भी सानिध्य लोगों को मिलता रहता था। वे लोग ज्ञान वैराग्य की शिक्षा यहां के लोगों को देते रहते थे।

 

1
ऋद्धि को सुमिरो सिद्धि को सुमिरो सुमिरो शारदा माई, अर सुमिरो गुरू अविनाशी को सुमिरो किशन कन्हाई
सदा अमर या धरती नि रैंदी मेघ पडे टुट जाए, अमर नि रैंदा चन्द्र सुरज चुचा गरण लगे छिपी जाए।
माता रोए जनम जनम को बैंण रोए छै मासा, तिरिया रोए डेढ़ घडी को आन करे घर बासा।
ना घर तेरा ना घर मेरा चिड़िया रैन बसेरा, हस्ती घोड़ा कुटुम कबीला रे चला चली का फेरा।
सुण ले बेटा गोपीचन्द जी बात सुणों चित लाई, झूठी तेरी माया ममता मति कैसी भरमाई।
कागज पतरी सब कुछ बांचे करम न बाचे कोई, राज करो ओ राज कुंवर चुचा करणी जोग लिखाई।
2
तोड़ा माया जाल छोड़ा लोभ त्यागा तृष्णा, राम हरे कृष्णा बोला राम हरे कृष्णा।
धरती यखी धरीं रैगे द्यौ टंग्यू को टंग्यू, राज रजौं का छुटिनी गेनी नंग्या नग्यूं।
घाम पडे पाणी उडे मेघ रूप रखी, कडके मेघ बरखे बरखा पाणी जख्या तखी
ऋतु आंदी जांदी रये बगदी गंगा नि रूके, डांडा कांठा जख्या तखी मनखि फिर नि दिखे।
बीज झडे जमे बढे डाली फूले फले, एक सुखे हांकी मौल्ये दुन्या यनी चले

 

                    श्रृंगार वीर और शान्त रस की गणना प्रधान रसों में होती है। क्योंकि ये उदात्तवृति के प्रेरक है और महाकाव्यों में इनमें से कोई एक रस प्रधान या अंगीरस के रूप में प्रतिष्ठित होता है। शांत का स्थायी भाव निर्वेद है। इसके देवता विष्णु माने गए हैं। पहले गीत में अनित्य असार संसार आलम्बन तथा गोपीचन्द भर्तृहरि आश्रय हैं। धरती का किसी के साथ न जाना, राजाओं के राज-पाठ का यहीं छूट जाना, झूठी माया ममता, संसार रैन बसेरा आदि उद्दीपन है। धृति, मति, विबोध संचारी भाव हैं। दूसरे गीत में भी अनित्य संसार आलम्बन हरिस्मरण आश्रय है। साथ कुछ नही जाना, संसार की नाशवान स्थिति, पुनर्जन्म आदि उद्दीपन हैं। धृति, मति, विवोध संचारी भाव है।

 

10. गढ़वाली लोकगीतोें में वात्सल्य रसः- गढ़वाली लोक साहित्य में वात्सल्य रस से भरपूर अनेक रचनाएं हैं। जब हम विवाह के मंगलगीत सुनते हैं उनमें अनेक गीत वात्सल्य रस से पूरित हैं। जब बेटी मंगल स्नान से निवृत होती है वहां पर-

 

1
नाई ध्वै की लाड़ी मेरी फुरफर्या ह्वे ग्ये।
पैर पैर लाड़ी मेरी रेशमी कापडी।
बाबाजी तुमारा लैनी बाजारू मुलैक
मांजी न तुमारी पिटारी सजैन।
नाई ध्वै की.......
पैर पैर लाड़ी मेरी जरद कापड़ी
बाड़ा जी न तुमारा लैनी हाठु मुलैकी
बडी जी न तुमारी पिटारी खोल्याली
नाई ध्वैकी लाड़ी मेरी.......
2
हे मेरी आख्यंू का रतन बाला स्ये जादी, दूध भाती द्योलू त्वेतैन बाला से जादी।
मेरी औंखुड़ी पौखुड़ी छेई तू मेरी स्याणी छे गांणी।
मेरी जिकुडी उखुडी ह्वेल्यू रे स्ये जाबोल्यू मानी।
ना हो जिदेरू ना हो बाबू जन, बाला स्ये जादी............
तेरी गुंदक्याली हाथ्यूं की मुठ्यूं मां मेरा सुख दिन बुज्यान।
तेरी तुरतुरी तौ बाली आख्यूं मां मेरा सुपिन्या लुक्यान।
मेरी आस सास त्वे मा ही छन बाला स्ये जादी........
हे पापी निदरा तु कक स्येई रैग्ये आज
मेरी भाड़ी कूण्डी सुजण लै ग्येनी घर बणौ काम काज
कब तै छट्योलु क्या कन क्या बुन बाला स्ये जादी।...........
3
मेरी उनाड्या माड़ी हे बीजी जादी, लाडुली बेटूली हे बीजी जादी।
सिर्वाणी को घाम ब्वे हे बीजी जादी, पैत्वाण्यूं ऐ ग्याई हे बीजी जादी।
दगडा की पन्द्यरी हे बीजी जादी, पाणी ले की ऐ गेनी हे बीजी जादी।
तेरो बांठा को दूध हे बीजी जादी, बिरालीन पियाली हे बीजी जादी।
बाटा का डेरो हे ब्वे बीजी जादी, तेरी कैसी नींदरा हे बीजी जादी।
क्या ह्वाई त्वै थै न, हे बीजी जादी, त्वे बाच ना सान हे लौ बीजी जादी।
तेरा बाला पराण हे बीजी जादी, कु देव लीगे होलु हे बीजी जादी।

 

                    वात्सल रस का स्थायी भाव पुत्रस्नेह है। पुत्रादि आलम्बन हैं। उनकी चेष्टाएं आलिंगन, अंगस्पर्श, आदि उद्दीपन है। अधिकतर संस्कृत के आचार्यों ने वात्सल्य को पृथक् रस न मानकर उसे श्रृंगार के अन्तर्गत गण्य माना है। परन्तु भोज, भानुदत्त, विश्वनाथ, हरिश्चन्द्र ने इसे पृथक् रस माना है। इस रस को काव्य में प्रतिष्ठित करने का श्रेय विश्वनाथ को प्राप्त है। वे अपने ग्रंथ ‘‘साहित्य दर्पण’’ में लिखते हैंः-
स्फुट चमत्कारितया वत्सलं च रसं विदुः
स्थायी वत्सलता स्नेह पुत्राद्यावलम्बनं मनम्
उद्दीपनादि तच्चेष्टा विद्याशौर्यादयादयः
आलिंगनांगसंस्पर्श शिरचुम्बनमीक्षणम्
पुलकानन्दवाष्पाद्यां अनुभावा प्रकीर्तिता
संचारिणोनिष्टशंका हर्षगर्वादयोमता।

 

                पहले गीत में मंगलस्नान से निवृत हुई पुत्री आलम्बन है। माता पितादि आश्रय एवं मंगलस्नान के बाद सौंदर्यवृद्धि, प्रेमपूर्वक दी हुई भेंटें, उद्दीपन को पुष्ट करती हैं। दूसरे गीत में पुत्र या पुत्री आलम्बन तथा मां आश्रय है। सुकोमल हाथ, तोतली बातें उद्दीपन में अभिवृद्धि करती हैं। हर्ष, स्मृति, उत्कंठा आदि संचारी भाव है। तीसरे गीत में माता-पिता आश्रय तथा सोई हुई बालिका आलम्बन है। पुत्री को जगाने की वृत्तियां एवं प्रलोभन आदि उद्दीपन को पुष्ट करती हैं। हर्ष मोह उत्कंठा आदि संचारी भाव है।

 

                        10. गढ़वाली लोकगीतोें में भक्ति रसः- गढ़वाल देवभूमि है यहां पर चार धाम, गंगा-यमुना का मायका, शिव का ससुराल है। यहां के लोक साहित्य में भक्तिरस विषयक अनेकों गीत मिलते हैं। विभिन्न देवी देवताओं के जागर, पांडवों की पण्डौं वार्ता, नन्दा के गीत आदि भक्तिरस से लबालब भरे हैं।
                            गढवाल के औजी, जागरी, आज भी इस प्राचीन परम्परा का निर्वहन कर रहे हैं। प्रातः काल समस्त प्रकृति, एवं देवताओं के जागरण के लिएः-

 

प्रभात को परव जाग गो स्वरूप पृथवी जाग
धर्म स्वरूपी अगास जाग, उदंकार कांठा जाग
भानुपंखी गरूड़ जाग, सतलोक जाग, मेघलोक जाग, इन्द्र लोक जाग

 

और फिर इसी क्रम में क्रमशः समस्त जीव-जन्तु, कीट-पतंग आदि के साथ साथ सभी समुद्र, और भारतवर्ष के सभी प्रमुख धार्मिक स्थलों का जागरण किया जाता है। साथ ही साथ क्षेत्रीय देवताओं का जागरण होता है जिनमें खोली का गणेश, मोरी का नारैण कुंती के पांडव आदि का प्रबोधन होता है।
आशीर्वचन में ब्राह्मण जहां संस्कृत में आशीर्वचन कहते हैं वही औजियों के द्वारा अपनी मातृभाषा में मंगलकामनाएं की जाती हैं-

 

यूं को राज रखो देवता, माथा बड़ो भाग दे देवता।
यूं का बेटा बेटी रखो देवता, यूं का कुल की जोत जगौ देवता।
अच्छा पति किशारियों की एक बड़ी अभिलाषा होती है, और इसी अभिलाषा के चलते मां ज्वाल्पा से वे प्रार्थना करती हैं कि-

 

1
हे देवी ज्वालपा सौंजण्या दे मिलाई, मेरा मैत की देवी सौजण्या दे मिलाई
दैत्य पुलम की कन्या सौजण्या दे मिलाई, शची न करी तेरी तपस्या सौजण्या दे मिलाई
इन्द्र जसो वर पाई सौंजण्या दे मिलाई, मेरी देवी................

 

                        इसी प्रकार सभी प्रकार के विघ्नों के भय से मुक्ति पाने के लिए क्षेत्रपाल, भूम्या, नाग, नरसिंह ग्वैल व अन्य स्थानीय देवताओं से प्रार्थना की जाती है। आग्नि की उपासना आर्यों में प्राचीन काल से ही चली आ रही हैं। गढ़वाल में मांगल-गीतों में अग्नि का आवाह्न व प्रार्थना की जाती है। एक मांगल-गीत में अग्नि व प्रार्थनाकर्ता के बीच में संवाद है-

 

2
प्रार्थी- ऐ जा अगनी ऐ जा अगनी मेरा मातुलोक
त्वे बिना अगनी ब्रह्मा भूखू रै ग्ये
अग्नि- कनु कैकी औलु कनु कैकी औलु तुमारा मातृलोक
तुमारा मातृलोक यू बड़ो अत्याचार हेऽऽऽऽऽ
अगनी लत्याला थूक थुकाला
तुमारी नगरी मां यू बडो अत्याचार हेऽऽऽऽऽ
अग्नि- कनु कैकी औलु कनु कैकी औलु तुमारा मातृलोक
तुमारा मातुलोक खोटो चलन
माणू ह्वेकी पाथु अडौंदा, ब्वारी ह्वेकी सासु सिखौदा हेऽऽऽऽऽ

 

भक्तिरस का स्थायी भाव भगवद्प्रेम है। आलम्बन ईश्वर या उसका कोई रूपे होता है। सत्संग, पुराणादि श्रवण उद्दीपन तथा रोमांच अनुभाव होता है। भक्तिरस के संचारी भावों में दैन्य, हर्ष आदि की गणना होती है। भक्तिरस को काव्य में स्थापित करने का श्रेय मधुसूदन सरस्वती तथा रूप गोस्वामी को प्राप्त है। इनके अनुसार भक्ति परमरसरूपा है। पहले गीत में विवाहेच्छु कन्या आश्रय तथा ज्वाल्पा देवी आलम्बन है। अच्छे पति की कामना, शची की तपस्या, और इन्द्र को पति रूप में प्राप्त करना आदि उद्दीपन तथा हर्ष, दैन्य, गर्व आदि संचारी भाव हैं। दूसरे गीत में प्रार्थी आश्रय एवं अग्नि आलम्बन है। अग्नि का आवाहन, प्रार्थना, अग्नि का मृत्युलोक में व्याप्त अनाचारों के कारण वहां न आना उद्दीपन को पुष्ट करता है। दैन्य, हर्ष आदि संचारी भाव इसमें पुष्ट हुए हैं।

 

सन्दर्भ ग्रन्थः-
1.गढ़वाली भाषा - विकीपीडिया https://hi.wikipedia.org/wikiगढ़वाली_भाषा
2. लिंग्स्टिविक सर्वे ऑफ़ इण्डिया- अध्याय 11 पृष्ठ संख्या 120
3. गढ़वाली साहित्य अर कला -आचार्य गोपेश्वर कोठियाल पृष्ठ संख्या 05
४. गढ़वाली लोकगीत - गोविन्द चातक पृष्ठ संख्या 67
5. गढ़वाली भाषा - गोविन्द चातक
6. गढवाली लोकगीत - गोविन्द चातक
7. काव्यशास्त्र डाॅ. भगीरथ मिश्र
8. अन्य गीत- नरेन्द्र सिंह नेगी के रिकार्ड,  https://www.youtube.com/channel/UCl1oDpiuEzmcg6zyxh_1Now  और सोशल मीडिया 

सोमवार, 5 अक्तूबर 2020

साँझ


साँझ 
नभ के मग पर पग - पग रखकर
शांत रूप कुछ अरुणिम होकर
घन-सघन को रक्तिम कर कर
दूर क्षितिज पर पहुंचा दिनकर 

देख क्षितिज पर रथ दिनकर का 
मन उद्वेलित हुआ विहग राशि का
अब तक जो भूले थे घर को  
अपना घर याद आया उनको


चोंच में ज्यादा दाना भरकर 
अपने बच्चों का खाना भरकर 
चिड़ियों ने नभ में पंख पसारे 
नभ में उनकी लगी कतारें 

इधर कुछ गाय चुगाते बच्चे 
सांझ बिसारे थे मस्ती में 
घर आओ आवाज आ रही 
उनके घर उनकी बस्ती से 
क्रमशः.......

रविवार, 2 अगस्त 2020

मेरा मन (MERA MANN)


बाहर बरसता घन सघन, अन्दर सुलगता मेरा मन।
बारिश की हर इक बूंद को, खुद में समाता मेरा मन।।
बाहर बरसता.............
कुछ मन उदास पहले ही था, कुछ तेरे कारण ऐ घटा।
कुछ शाम की तन्हाई थी, कुछ उनकी थी रूसवाईयां
ये सब हुए एक साथ लेकिन, फिर अकेला मेरा मन
बाहर बरसता.............
बारिश की बूंदें बाण बनकर, बेधती है तन बदन
सावन की हर शीतल पवन, मन में जलाती इक अगन
और फिर इस आग को, आंसुओं से सींचे दो नयन
बाहर बरसता.............
शून्य से गिरती हैं बूंदें, मेरे मन के शून्य में
अधीर हो उठता हृदय जब, तस्वीर बनती शून्य में
फिर तसव्बुर में खयालों में रहे ये मन मगन।
बाहर बरसता.............
सोचता हूं तुम चले आते हो, इस बरसात में
मेघ जल भीगा बदन, लेकिन लबों पर प्यास है
और फिर इस प्यास को, पाने को तरसे मेरा मन।
बाहर बरसता.............
ये बुलबुलों का शोर और ये मेघमय तड़िता चपल
ये मिट्टी की सौंधी महक हर शाख पर पल्लव नवल
फिर घन नदी पर, घन पवन पर, घन धरा, घनमय गगन।
बाहर बरसता.............
मोटी मूसलधार जलधर जब धरा पर डारता
तृप्त कर वसुधा, पवन का शुष्कपन संहारता
अतृप्त मेरा तन-बदल तृषित रहे ये मेरा मन
बाहर बरसता.............

चौंक पड़ता हूं तुम्हे जब देखता हूं भीगते
नभ के नवागत अभ्र को अधरों को तेरे सींचते
अहोभाग्य अभ्र! दुर्भाग्य तू कह मुझ को कोसे मेरा मन
बाहर बरसता.............
ये बहारें ये फुहारें और फिर मौसम सुहाना।
पत्तियां पल-भर परखती मेघ जल का उनपे गिरना
स्वच्छ निखरी पत्तियां और आसमां पर घन गहन
बाहर बरसता.............
देखता हूं दूर पर कुछ एक विरहन कांपती
आंख से काजल बहाती सोई हुई सी जागती
पाद-नख भू चीरती हो बीते ख्वाबों में मगन
बाहर बरसता.............
वो जहां बैठी हुई है है पहाड़ी एक छोटी
सब तरफ सब कुछ अचर है, चर हवा है, और पानी
देह के सब अंग अचर बस चर रहा है प्राण औ मन
बाहर बरसता.............
उसका मन उसको उठा कर ले गया बीती स्मृति में
ऐसी ही बारिश थी उस दिन ले गया ऐसी स्मृति में 
पी का पहला ही परश व्याकुल हुआ था उसका मन
बाहर बरसता.............
सिर को घुटने रख के बैठी प्रिय पति प्रतीक्षिता।
यौवन की वय कामार्तमय, रोमावली थी पुलकिता।
कैसे मिलन हो प्रिय पी का कर रही सौ सौ जतन।
                                                       बाहर बरसता.............
कुछ धूप में थे तप्त पत्थर और अब बारिश में भीगे
शीत से संतप्त हो वे पत्थरों में बैठ भीगे
आज भी उन पत्थरों पर जा के लोटे मेरा मन
बाहर बरसता.............
पत्थर की हरिता घोटकर पी की हथेली पर लगी
मैं हथेली और वह मुंह मेरा देखती ही रही
कर कमल पर देख पाटल स्तम्भित हुए थे ये नयन
बाहर बरसता.............
मन समन्दर में कई बातें उठे हिल्लोल कर 
पहुंचकर तट होंठ पर उद्विग्न होता शान्त कर
दमन कर दुर्दम्य का उछ्वास छोडे मेरा मन
बाहर बरसता.............
नदी घाटी से मेघ जल भर शिखर के आलम्ब से
स्वर्ग जाते मेघ देखे बनते बिगडते बिम्ब से
तन युगल का स्थिर हुआ मन मेघमय उड़ता गगन
बाहर बरसता.............
स्वर्ग में सुख है निरन्तर पर नही सुषमा वहां
सुख छोड़ सुषमा संग पाते रेत में मृग से वहां
स्वर्गीय सुख नैसर्गिकी सुषमा पे वारे उनका मन
बाहर बरसता.............
अनमने से थे वहां सुख सम्पदा के मध्य में
मन ही गया था स्वर्ग में मन ही नही था स्वर्ग में
सुन तेज तड़ित की ताड़ना वसुधा को भागे युगल मन
बाहर बरसता.............

-अनिल डबराल
फोटो गूगल साभार 

शनिवार, 25 जुलाई 2020

अर्थहीन (ARTHHEEN)



अर्थहीन

शाश्वत समझकर देह को
न देही का कुछ भान है।
बस भौतिकी का ज्ञान है,
बस भौतिकी का ज्ञान है।।


जीवन हुआ है अर्थहीन,
है अर्थयुक्त पर अर्थहीन
जीवन और अर्थ परार्थ हो!
न हो तो वह है व्यर्थ हीन।।

आराम की है तलाश पर,
आ राम! की चाहत नही
चाहे निमिष या दीर्घ सुख
आराम कर आ राम! कर।।

बस सुयश की कामना हो,
प्रेम में कोई काम ना हो।
जीतता है विश्व वो,
ना कामना हो काम ना हो।।

वक्त पर जब पर न हों,
पर पर लगा मंजिल चले।
पर पर सदा पर पर ही हैं
पहुंचे कही पर पर रहे।।

अनिल डबराल


शनिवार, 11 जुलाई 2020

सीख (SEEKH)




1
बागबां ने बरसों पहले
उम्मीद का एक पौधा रोपा था
सोचा था गुलों से महकेगा गुलशन
दरख़्त बनते ही पनाहगार बना उल्लू का
फिर वही कहानी पुरानी

2
बिस्तर पर एक तरफ मैं लेटा था,
तो दूसरी तरफ चंद सिक्के मेरी पहुँच से दूर थे....
बिना कुछ किये उन्हें अपनी तरफ खींचना चाह रहा था 
पर वे टस से मस न हुए 
बाद में पीटने लगा था बिस्तर 
फिर सरकने लगे थे मेरी तरफ...........
अब समझ में आया बिना कुछ किये कुछ नही होता 
हाथ-पाँव तो मारने ही पड़ते हैं.

गुरुवार, 25 जून 2020

मारियो की याद (MARIO)


Photo source: polygon


मारियो की याद (MARIO)

साल बीते सर्दियों की उन दिनों की बात है,
बस घूमकर बीते थे दिन ये उन दिनों की बात हैं

दूर मेरा गांव पहाड़ी और पहाड़ी जिन्दगी
पर हमारी जिन्दगी थी मस्त मौला जिन्दगी
स्कूल थे सब बन्द तब शीतावकाश की बात है
बस घूम कर बीते......................
साल बीते सर्दियों की..................
कुछ हम जवां कुछ दिल जवां और मारियो भी था नया
और उसे रानी दिलाने भटके न जाने कहां कहां।
पर उसे रानी मिली ना ये गजब की बात है
बस घूम कर बीते......................
साल बीते सर्दियों की..................
पंकज जोशीला जोश में आकर ये कहता जोर से
‘‘भैस की आंख आज आर या पार’’ सबको डराता शोर से
दूजी स्टेज पार करली बड़े गर्व की बात है
बस घूम कर बीते......................
साल बीते सर्दियों की..................
रोहित टि-टीट कर चल पड़ा थी सामने बतखों की फौज,
कुछ उड़ रहे कुछ चल रहे, पता ना चला किसने मारी चोच
छोटा हुआ चलता रहा ये बर्गर की सौगात है
बस घूम कर बीते......................
साल बीते सर्दियों की..................
नब्बी नया था खेल में हरवक्त पूछे ‘‘अब क्या कन’’
भैजी ईं स्टेज पार करै द्या अब तुमरी हथ च बचण या मुन्न।
नब्बी के बदले खेलता मैं सब कहते ये गलत बात है।
बस घूम कर बीते......................
साल बीते सर्दियों की..................
नब्बी उछालता मारियो खुद भी उछल पड़ता था वो
जोर से दबाकर बटन रिमोट खराब करता था वो।
दीवार तोड़ पैंसे कमाता बडी निराली बात है।
         बस घूम कर बीते......................
 साल बीते सर्दियों की..................
‘‘झांस-रांस को’’ चल पड़ा मोहित जो चैथी स्टेज में,
अनजान था स्टेज से फिसलन हुई थी बर्फ से।
एक बतख उल्टा किया कहा ‘‘तेरी यही औकात है’’
         बस घूम कर बीते......................
 साल बीते सर्दियों की..................
                                                                                                  
-अनिल डबराल 




बुधवार, 17 जून 2020

बच्चे (Children)

photo source- google

बच्चे

अभी आकाश सूना था,
अभी नभ नीले रंग में था।
अभी स्कूल में थे बच्चे और,
मैं अपनी छत पे बैठा था।

बजी घंटी हुई छुट्टी, 
बच्चों ने बांध ली मुठ्ठी।
बच्चे अपने घर को भागे,
ज्यों ट्रेन स्टेशन से छूटी।

खा-पीकर केे अब बच्चे,
अपनी अपनी छतों पर हैं।
पतंग और डोर ले हाथों में,
अब नभ को सजाते हैं।

ये बच्चे प्यार की सूरत,
ये बच्चे ईश की मूरत।
अभी जो लग रहे तारे,
वो कल नभ के बनें सूरज।

हल्की सी डांट पे रो देते
हल्की सी लाड़ पे हँस देते।
किलकारियों अठखेलियों से
ये घर आंगन सजा देते।
                                    अनिल डबराल