शुक्रवार, 22 अगस्त 2025

Ghasyeri (घस्येरी)

अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस 2022


लेबल:

रविवार, 10 अगस्त 2025

अनुशासित


लेबल:

शुक्रवार, 4 जून 2021

नज़र और चश्में




चश्मा बेच रहा था वह।
अलग-अलग नज़र के चश्में थे उसके पास
नज़र अपनी भी खराब थी
पर खराबी भी समझ नही आ रही थी।

बड़े-बड़े लोगों को देखा है
बुद्धिजीवियों की नजरें भी देखी
एक विशेष चश्मा उनकी आंखों में था।
कइयों ने एक जैसा ही चश्मा पहना था
कुछ के चश्मे अलग अलग थे।

नज़र उनकी भी खराब रही होगी,
पर उनको उनका चश्मा मिल गया है,
उनके हिसाब का, उनकी पसंद का, 
वे उसमे जंचते भी बहुत है,
लोगों ने पसन्द किया भी बहुत है।

उन्होंने अपना चश्मा लोगों को भी दिया,
कई अब उनके चश्मे दे देखने लगे हैं,
जब किसी को उनका चश्मा नही भाया,
उन्होंने कहा- कुछ दिन पहने रखो!
फिर 'ठीक' दिखने लगेगा।
अब उसे वैसा ही दिखने लगा है,
अब उसे उनका 'ठीक' दिखने लगा है

चश्मे वाले ने कहा- कहाँ खो गए भई!
बताओ को से चश्मा दूं?
अधुनातन या पुरातन?
पौर्वात्य या पाश्चत्य?
समाजवादी, गांधीवादी, या मार्क्स का,
चश्मों की सूची पढ़ता गया वह,

मैंने कहा- तुमने चश्मा नही लगाया?
उसने कहा- मेरी नज़र ठीक है।
अब सोच रहा हूँ कि
ये 'ठीक' ठीक है? या वो 'ठीक' ठीक है
मेरी नज़र खराब है? या मेरी नज़र ठीक है?

लेबल:

शनिवार, 11 जुलाई 2020

सीख (SEEKH)




1
बागबां ने बरसों पहले
उम्मीद का एक पौधा रोपा था
सोचा था गुलों से महकेगा गुलशन
दरख़्त बनते ही पनाहगार बना उल्लू का
फिर वही कहानी पुरानी

2
बिस्तर पर एक तरफ मैं लेटा था,
तो दूसरी तरफ चंद सिक्के मेरी पहुँच से दूर थे....
बिना कुछ किये उन्हें अपनी तरफ खींचना चाह रहा था 
पर वे टस से मस न हुए 
बाद में पीटने लगा था बिस्तर 
फिर सरकने लगे थे मेरी तरफ...........
अब समझ में आया बिना कुछ किये कुछ नही होता 
हाथ-पाँव तो मारने ही पड़ते हैं.

लेबल:

सोमवार, 8 जून 2020

बादल

बादल
PHOTO SOURCE: GOOGLE

बादल हूं मैं या बादल की तरह बिखरा हुआ हूं,
धरा से दूर हूं पर............. न नभ तक पहुंचा हुआ हूं.......
न डर है मुझे खुद से धरा को देखकर...
ना गर्व है कि मैं गगन को चूमता हूं।
रात- दिन करता हवा के संग सफर
लक्ष्यहीन हूं या लक्ष्य से भी पार तक पहुंचा हुआ हूं।
                                                                                                                  
-अनिल डबराल

लेबल:

गुरुवार, 21 मई 2020

मुक्तक (MUKTAK)

मुक्तक


muktam-poem-of-anil-dabral


मेरे दिल को तुम्हारे दिल से मिल जाने की चाहत है।
मगर हर राज अपने दिल में दफनाने की आदत है।।
इसी उलझन में उलझा हूं, बड़ी नाजु़क सी हालत है।
कहे कैसे, रहे कैसे, जीएं कैसे मरे कैसे?

तेरे दीदार करने का बहाना भी नही मिलता।
तेरे बिन मीत अब ये मन कहीं कुछ भी नही लगता।।
तेरी सोहबत में हूं तो वक्त को पर-पंख लगते हैं।
तेरे बिन साथिया ये वक्त काटे भी नही कटता।।
-अनिल डबराल

लेबल: ,