अंजान दुश्मन (ANJAAN DUSHMAN)


GANGU- SENA KA EK SIPAHI

अंजान दुश्मन

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बात आज से लगभग दस-ग्यारह साल पुरानी है, हमारे गांव में एक नया जानवर आया था। जो भेड़-बकरियों के बच्चों को अपना सुलभ शिकार बना रहा था। लोगों के कटहल, पपीतों का नाश कर रहा था। लोग कहते थे कि जब हम गाय-बकरियां चुगाने जाते हैं तब यह गौशाला में जाकर छोटी बकरियांे को मार डालता है। मैं भी इसके बारे में काफी बार सुन चुका था।

      हमारे गांव के पास एक बरसाती गदेरा है। इस गदेरे में बरसात के एक-दो महीने ही पानी रहता है, लेकिन यह भयानक इसलिए है क्योंकि यहां दिन में भी घुप्प अंधेरा रहता है। एक जमाने में जब हम खेलों में मस्त होकर गाय चुगाते थे तो समय का पता ही नही चलता था। अंधेरा होने पर गायों की खोज होती थी। जब गायों लम घर लाते समय बांस गदेरे में पहुंचते तो डर जाते थे, लेकिन यहां झाड़ियों में निवृत होते वृद्धों का बड़ा सहारा मिलता था। ये लोग हमें देखते ही खांसने लगते थे कि कहीं हम उन्हे अचानक देखकर डर न जाए। कान में जनेउ सामने रखा लोटा और कहते रहते थे ‘‘ऐजा बाबा ऐजा बाबा डौरी ना रे’’

एक बार मैं और टीटू बांस गदेरे की तरफ जा रहे थे। कि तभी टीटू ने भयभीत होकर धीरे से कहा- ‘‘भैजी वे खैण क डाल मां दिखदी’’ मैंने वहां देखा तो एक जानवर पेड़ पर बैठा था। उसकी झब्बेदार पूंछ पर काली-सफेद लाइनें बनी थी। उसका पूरा शरीर भी इसी प्रकार का था। हमारी आंखें चार होते ही वह नौ-दो-ग्यारह हो गया। उसका भागते देख हमनें गांव के पालतू कुत्तों को विमल की सिग्नल सीटी  से सिग्नल दिया। और कुछ ही क्षण में कुत्ते हमारे साथ थे। गांव भर के पालतू कुत्ते विमल के दोस्त थे। और हों भी क्यों न उनके लिए वह हर प्रकार से रोटी की व्यवस्था करना, नहलाना उसके रोज के काम थे।

      हमसे मिलते ही कुत्ते खुश हो जाते थे कि आज पता नही क्या एडवेंचर करने को मिलेगा। हम क्या-क्या एडवेंचर करते थे ये बस कुत्ते और हम ही जानते थे।

      हमने सिंटी (कुतिया) का वो जगह सुंघाई जहां पर वह जानवर पेड़ से उतरा था। सिंटी भी सूंघकर पागलों की तरह कूं-कूं करती हुई चारों ओर दौड़ने लगी। गंगू और कालू (कुत्ते) भी उसके साथ दौड़ने लगे। वे कभी झााड़ियों में घुसते कभी बाहर आते। इन सब को देखकर लग रहा था मानों ये किसी बड़े युद्ध की तैयारी कर रहे है और अपने प्रतिद्वन्दी को खोजने के लिए पागल हुए जा रहे है। कुत्ते भी अजीव जानवर होते हैं। अपने से चार कदम दूरी पर बैठी मुर्गी के पास सुंघकर चले जाते हैं। पर चार कदम दूर से उस देख नही पाते।

अचानक सिंटी तेजी से दौड़ते हुए आगे भागी। मानो उस उस अंजान दुश्मन के अड्डे का पता चल गया हो। गंगू और कालू भी तेजी से वहां पहुंचे। हमारे लिए वहां से जाना सम्भव नही था। फिर भी टीटू वहां से जाना चाहता था। पर मैंने मना कर दिया मैंने सोचा दुश्मन अंजान है, पता नही उसके तरकश में कौन-कौन से तीर होंगे। हम दूसरे रास्ते से होते हुए उस स्थान पर पहुंचे। हमारे सामने तीनों कुत्ते एक गुफा के सामने खड़े थे। हम गुफा से थोड़ी दूरी पर थे। हमारे और गुफा के बीच में लगभग दो मीटर का फासला था। और यह फासला एक गदेरे के कारण था।

उस दुश्मन से लड़ने के लिए हमारे पास तीन सूरमा थे। पर दुश्मन को कभी कम नही आंकना चाहिए। इसलिए टीटू को फेंकने लायक पत्थर देकर मैंने पेड़ पर चढ़ा दिया। और खुद मैदान में डटकर सेना का हौसला बढ़ा रहा था।

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वह अन्जान दुश्मन एक बड़े पत्थर के नीचे गुफा में बैठा गुर्रा रहा था। मन में तरह-तरह के खयालात आ रहे थे। एक क्षण के लिए मैंने सोचा कि अगर यह दुश्मन बाहर आ जाता है, और कुत्ते भाग जाते हैं तो यह मुझ पर ही हमला करेगा। पर कुत्ता और घोड़ा स्वामीभक्त होता है। इस रणभूमि में मुझे वीर चेतक की याद आ गई कि किस प्रकार घायल होते हुए भी वह स्वामी को शत्रुओं के बीच से उड़ा ले गया था।

      सेनानायिका सिंटी गुफा के बाहर गर्जना कर के थक गई थी। अब यह काम उसका पुत्र गंगू कर रहा था। लेकिन अंजान दुश्मन का यह दुर्ग अटूट था, और वह अन्दर से लगातार गुर्राहट कर रहा था। काफी समय के परिश्रम के बाद जब कोई फल नही मिला तो सेना का हौसला टूटने लगा। ऐसा होते देख मैंने अपने हाथ में एक डंडा उठा लिया। सेना ने सोचा शायद यह उनकी नाकामयाबी का ईनाम है। पर मुझे पता था कि सेना ने भरसक प्रयास किया है। मैंने वह डंडा गुफा में घुसेड़ दिया। उस डंडे पर मुझे कोमलता का अनुभव हुआ, मेरे मन में दया का भाव आया ही था कि वह फिर से गुर्रा दिया।

सेना को लगा कि अंजान दुश्मन कप्तान पर अकड़ रहा है, वह फिर गुफा के बाहर श्वाननाद करने लगी। मैंने दुवारा डंडा गुफा में डाला सेनानायिका सिंटी इतनी उत्साहित हुई कि उसने अपना मुंह गुफा के उस छोटे से छेद में डाला और खूब भौंकी, जब मैनें डंडा बाहर निकाला तो वह उस डंडे पर झपट पड़ी। मैं समझ गया कि वीरता और उत्साह का चरम यही पागलपन है।

अब तीनों ने फिर से जोर लगा दिया। सेना अंजान दुश्मन के किले को खोदने लगी। वहां पर कुछ बड़े-बड़े पत्थर थे जिनको वे हिला न सके, यह काम कप्तान के डंडे ने कर दिया। जैसे ही पत्थर हटे मेरा दिमाग बहुत तेजी से चलने लगा। कि अगर ऐसा होगा तो मैं ऐसा करूंगा। जितना तेज तब मेरा दिमाग चल रहा था, उतने ही तेज अब मेरे हाथ कहानी लिखते हुए चल रहे हैं। क्योंकि मैं इस समय जोश से भरा हूं। पाठकों तक उस घटना का हर क्षण पहुंचा रहा हूं। इस समय मैं अपना लिखा हुआ नही देख पा रहा हूं, क्योंकि मेरे सामने वही है अंजान दुश्मन और उसका एन्काउन्टर.....
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      अचानक सिंटी ने गुफा में मुंह डाल दिया अंजान दुश्मन उस पर झपट पड़ा। एक क्षण के लिए उसकी डरावनी आंखें मेरे सामने थी। वे खतरनाक ढंग से चमक रही थी। सिंटी घायल हो गई थी पर उसने अपना सिर गुफा से बाहर नही निकाला। वह वहीं डटी रही। बाहर कालू और गंगू व्यग्र होकर इधर-उधर घूम रहे थे। वे चाहकर भी अपनी साथिनी की मदद नही कर पा रहे थे। परन्तु सिंटी उस अंजान दुश्मन से उलझी हुई थी। उसकी घायल होकर निकलने वाली आवाज हम लगातार सुन रहे थे कि तभी सिंटी के मुंह में अंजान दुश्मन का मुंह आया और उसने उसे गुफा से बाहर खींच दिया। बाहर निकलते ही सारी सेना उस पर टूट पड़ी। उसको कुत्तों से घिरा देख उसको बचाने के लिए जब तक हम उसके पास पहुंचते तब तक कुत्तों ने उसे मार डाला था। हमारी आवाज सुनकर पुरणी दादी भी घटनास्थल पर पहुंच गई। उस जानवर को देखकर दादी खुश हो गई। दादी कहने लगी- ‘‘ई बाप्पा हैं! क्य जानवर च यू? अर क्या पैन दांत छिन येक, यौऽऽऽ अर मारी द्या न तुमुन इी कौर.... हे बुबा! भौत नुकसान कौर येन, ऊं दीपू होरूक सब कठल, चिनख येन ही त खैन... पर चलो अब खूब ह्वे गया ना.......।  सारा गांव खुश था। कि उनका नुकसान करने वाला अब नही रहा, उनकी बकरियों के बच्चों को खाने वाला समाप्त हो चुका है। पर हम दोनों-तीनों भाई आज भी उस घटना को लेकर  में रहते दुविधा में रहते हैं कि, क्या ये सही था?

                                                                  

                
-अनिल डबराल

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