साँझ


साँझ 
नभ के मग पर पग - पग रखकर
शांत रूप कुछ अरुणिम होकर
घन-सघन को रक्तिम कर कर
दूर क्षितिज पर पहुंचा दिनकर 

देख क्षितिज पर रथ दिनकर का 
मन उद्वेलित हुआ विहग राशि का
अब तक जो भूले थे घर को  
अपना घर याद आया उनको


चोंच में ज्यादा दाना भरकर 
अपने बच्चों का खाना भरकर 
चिड़ियों ने नभ में पंख पसारे 
नभ में उनकी लगी कतारें 

इधर कुछ गाय चुगाते बच्चे 
सांझ बिसारे थे मस्ती में 
घर आओ आवाज आ रही 
उनके घर उनकी बस्ती से 
क्रमशः.......

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